“फल की इच्छा किए बगैर कर्म करते जाओ” गीता का यह संदेश हम सभी की रग-रग में समाया है। भावनाओं का स्पर्श कर्म प्रधान जीवन को भी कभी-कभी नई चेतना से भर देता है।
पद, प्रतिष्ठा की चमक-दमक के बीच मानवीय संवेदना का झरना बहता ही रहता है। लेकिन वह लुप्त हो चुकी सरस्वती की भांति होता है। कभी-कभी कुछ घटनाओं की वजह से संवेदना के उस कल-कल बहते झरने के स्वर हमारे ह्रदय मंदिर को आंदोलित कर जाते हैं।
कुछ महीने पहले ही केरल जाना हुआ। तब माननीय सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति जस्टिस श्री कृष्ण अय्यर से सहज ही मिलने पहुंचा।
सामान्य स्तर का छोटा-सा घर, पुस्तकों के ढेर के बीच एक छोटा-सी टेबल और कुर्सी, खिडक़ी से आता प्रकाश। सौम्यता, नम्रता और वात्सल्य से भरपूर व्यक्तित्व के धनी और उम्र के 90 बसन्त से भी ज्यादा देख चुके जस्टिस श्री अय्यर के दर्शन का सौभाग्य मुझे मिला। वह पल मेरे लिए हमेशा प्रेरणादायी रहेगा।
कन्या शिक्षा को लेकर मेरी भावनाओं से सभी लोग परिचित है । गुजरात द्वारा किए गए प्रयोगों और प्रयास के सुफल से सभी को लाभ हुआ है। इस सम्बंध में अधिक जानकारियां यहाँ (Link Here) उपलब्ध है ।
आज इस बात का जिक्र करने की वजह यह है कि, कुछ महीनों पूर्व ही जस्टिस श्री के. अय्यर का इस विषय से सम्बंधित प्रेरक पत्र मुझे प्राप्त हुआ। यह पत्र मेरे लिए उत्साहवद्र्घक था। लगा कि, जिससे मुझे आनन्द हुआ, उत्साह मिला, उसमें आप को भी शामिल करुं। वैसे भी, यह बात सत्य है कि आनन्द और उत्साह बांटने से बढ़ता है। और यही उत्साह, उमंग तथा आनन्द ज्यादा कार्यशक्ति का सर्जक भी बनता है।

जस्टिस श्री अय्यर का पत्र और जवाब में लिखे मेरा पत्र यहाँ उपलब्ध है )
Letter 1- Honorable Justice Iyer’s letter to Shri Narendra Modi
Letter 2- Shri Narendra Modi’s reply to Honorable Justice Krishna Iyer